काश कुछ ऐसा होता

काश कुछ ऐसा होता

सोचती हूँ काश कुछ ऐसा होता
सब कुछ जैसा मैं चाहूं , वैसा होता |

जब मन में कोई ख्वाहिश पनपति
 लक झपकने से पहले परिपूर्ण होती |

फिर ना ही मुझे किसीसे करना पड़ता इज़हार
और ना ही करना होता किसी चीज़ का इंतज़ार \

लेकिन क्या मैं सच में खुश होती
आसानी से मिली सफलता को अपनापाती |

कभी कभी ठीक है अनजाने सफलता पाना
बिना मेहनत किए ही,हर सुख का आना |

मन क्यों फिर,खुद को ही धिक्कारता है
छोटी छोटी बातों पर नाराज़ हो जाता है |

अपने हाथो पाई छोटी चीज़,बहुत बड़ी होती है
वही सच्ची खुशियाँ है,जो उसके बाद आती है |

इस लफ्ज़ ‘काश’ से,कभी ज़िंदगी उलझती है
और लफ्ज़ ‘काश’ से,सपनो की राहे सुलझती है |

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jaise soch wo hi dekhai de

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एकांत जगह,सुंदर वन में,घने हरे पेड़ के नीचे
हर एक पन्ने पर वाल्मीकि,रामायण की महान गाथा लिखते
जब वो राम गाथा अपने शिष्यों को कथन करते
अदृश्य रूप में हनुमान भी उसे श्रवण करने आते
सिताजी को अगवा कर रावण ने रखा था अशोकबन में
जब राम गाथा का,ये चरण चला
सिताजी के गम से,सब का हृदय हिला
जब वर्णन हुआ,जिस वृक्ष के नीचे सिताजी थी बैठी
उस वृक्ष के सारे फूल थे सफेद
हनुमान तुरंत असली रूप में आकर बोलें
वाल्मीकि यहाँ मुझे आपसे है मतभेद
याद है मुझे पक्का,चाहे बीते हो इतने साल
सफेद नही,उस वृक्ष के सारे फूल थे लाल
अपनी अपनी बात पर दोनो अड्डे
सुलझाने ये उलझन रामजी के सामने हो गये खड़े
रामजी बोलें,वो फूल थे सफेद,वाल्मीकि है सही
हनुमान तुम्हे सफेद फूल नज़र आयें लाल
क्योंकि तुम्हारा अंतर मण तब था गुस्से से भरा
मान के गुस्से का लाल रंग तेरी आँखों में था उतरा
हनुमान समझ गये रामजी की बातें
इस छोटे कथन से हम भी आओ कुछ सीखे
जैसी हमारी सोच होती,हुमे वोही देखाई दे
इसलिए अपनी सोच में,लाल गुस्सा नही,श्वेत की शीतलता रखे.