यूही शाम ढलते

यूही शाम ढलते तेरा चुपके से आना

परदे के पीछे खड़ी होकर मासूम मुस्कुराना

 

चाय का लुत्फ़ लेता अख़बार में खोया मैं

हवाओ संग लफ़्ज़ों का कानो में गुनगुनाना

 

हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो

याद बहुत आए तेरा दिल पे दस्तक दे जाना

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चाह कर भी रूक नही सकता

चाह कर भी रूक नही सकता अमर वो वक़्त हूँ
छाया मिले निज संसार मैं धूप खड़ा दरख़्त हूँ
सब कुछ पाकर भी चैन कहा भागती है हसरते
 ज़ीले मन मर्जी  लौट ने वाला लम्हा फक़्त हूँ |

खुदा-ए-अज़ीज

खुदाअज़ीज तेरे दर पे एक ही बड़ी चादर चढ़ाउँ तो काफ़ी होगी 
वक़्त के साथ तुझसे माँगनेवालों की दुआओं की फेहरिस्त लंबी होगी |

कुछ यूँ ही

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1..  जब संग तुम्हारे होती हूँ सनम 
      ज़िंदगी की मंज़िले और भी करीब नज़र आती है  |

2,, ये तन्हा रहने की ज़िद्द कबसे करने लगी हो 
      नदिया को एक दिन सागर में समा जाना है.  |

3,, एक तस्वीर बनाई है तुम्हारी दिल में 
     अपने तकदीर की लकीरों से 
     इंतज़ार कर रही हूँ चित्रकार 
    तुम आओ,और प्यार के रंग भर दो  | 

4,, हम तो अजनबी थे यहाँ पर एक दिन 
      अब सब कुछ अपना सा लगने लगा है 
      आपके रंग में ऐसे रंग लिया खुद को 
      हमारे ख्वाहिशों का घर भी सजने लगा है.  |

5,,  अब दिल में बस ये तमन्ना  है बाकी 
      जाम छोड़ के मुझे साथ लेजा तू साकी  |

6,,  यादे धुंधली हो कर भुलाई जाती है वक़्त के साथ 
      किसी  की और हमारे रुख़ बदल जाते है वक़्त के साथ 
      जो कभी दिलजान से ज़्यादा अज़ीज़ हुआ करते थे 
      वो भी पराए हो जाते है  हमसे वक़्त के साथ.  |

वक़्त की रफ़्तार

वक़्त की रफ़्तार

वक़्त अपनी रफ़्तार में मुझे भी ढलने दो  
मैं भी एक जर्रा हूँ तेरे लम्हे से गिरा हुआ  |
 
कितनी जल्दी है तुझे,कहाँ पहुँचना है बताओ 
तुम्हे भाग भाग कर पकड़ना नही होता मुझ से 
रुक जा कही,साँस तॉ लेलुँ ज़रा,खुद के खेल ना रचाओ 
तेरे कदमो से कदम मिला कर,कभी मुझे भी चलने दे 
 
वक़्त अपनी रफ़्तार में मुझे भी ढलने दो  
मैं भी एक क़तरा हूँ तेरे लम्हे से मिला हुआ  |
 
कभी तुम धीमे चलते हो,मेरे पीछे रहते हो 
मूड मूड कर देखती रहती हूँ तुझे,के पास आओगे 
छुप जाते हो तुम,जब मुझे किसी का इंतज़ार होता है 
ज़रूरत होगी इस दिल को तेरी,क्या तब साथ रह पाओगे 
 
वक़्त अपनी रफ़्तार में मुझे भी ढलने दो 
मैं भी एक आस हूँ तेरे लम्हे से जुड़ा हुआ  |

वक़्त ही बाकी रह गया है

वक़्त ही बाकी रह गया है

अक्सर सुनती आई हूँ,वक़्त की कमी है |
मेरी आँखों में बस, तेरी यादों की नमी है ||

एक वक़्त था जब,हम लम्हा लम्हा जिये थे |
इश्क़ की मधुरा ,तुम्हारे साथ साथ पिये थे ||

सच कहते है सब,के वक़्त रेत का टीला है |
समझ नही पाए खेल,वक़्त ने जो खेला है ||

वक़्त ही तो था , तुम सावन से आए थे |
वक़्त ने ही बताया , तुम बस साये थे ||

वक़्त ने ही हमारे, इश्क़ का बिगुल बजाया |
वक़्त ने ही हमारे , अरमानो को सजाया ||

ढूँढ रही हूँ आज, वो वक़्त कहा खो गया है |
मुझे ख्वाब से जगाया ,और खुद सो गया है ||

यारा इश्क़ के साथ , मेरा सब कुछ चला गया है |
अब तो एक इंतज़ार, और वक़्त ही बाकी रह गया है ||

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