झुरियाँ

Image and video hosting by TinyPic

झुरियाँ

“डाकिया” आवाज़ सुन
दौड़ के जाना चाहती आँगन
थके हुए कदम रुक रुक कर ही चलते
थैले से निकलते काग़ज़ देख चहेरा उत्सुक होता
झुरियों की हर लकीर मुस्कुरा के कहती
‘ ला दे हमारी चिट्ठी,पढ़ के भी सुनाइयो
कैसा है लल्ला,तबीयत ठीक,हालचाल बताईयो ‘
निर्विकार उत्तर ‘मनी ऑर्डर है,चिट्ठी नही ‘
यन्त्रवत उसके हाथ अंगूठा लगाते
हर महीने यही तो होता था
झुरियों पर उदासी के बादल मंडराते
सब देखता डाकिया,मन की नम आँखों से
ज़िंदगी के अनेक सपनो से बनी हर झुरी को
बेबस झुरियों के भाव शांत हो जाते
मगर,नीर रुकते नही,आस थमती नही
व्यस्त होगा लल्ला,शायद अगले माह…..


कुछ शब्द भेज दे……………….
 
 

 

 

Advertisements

शब्दांचे आंगण

शब्दांचे आंगण किती निराळे 
शब्दांचे जग एकदम वेगळे 

शब्दांच्या घरात मी पण रहाते 
शब्दान मधूनच आपल्या भावना पहाते 

शब्द  कधी असतात जुई सारखे नज़ूक 
शब्द कधी असतात दगडा सारखे कठोर 

शब्ध कधी होतात ओसाड  रान
शब्द कधी हिरवे,कधी पिवळे  पा

शब्द कधी हळूवार वाहणारा झरा 
शब्द कधी टप टप पावसाच्या गारा 

शब्द सुरांचे,सगळ्यांना हवेसे 
शब्द बोचरे ,एकने पण नकोसे 

शब्दांचा सुशोभित बाण,जपुन वापरावा 
शब्दाने घायाळ कोणी,निर्माण करतो दुरावा 

शब्द आपले दुसर्यांच्या हृदयात फुलावे 
शब्ढ साखर दुधात मिसळून बोलावे.