फ़िज़ा

फ़िज़ा

यूँ ही आज ख़याल आया , देखु रूप पलटकर
कुछ पल महसूस करू , फ़िज़ा में बदलकर |

फ़िज़ा बनकर मैं , आज़ाद हो चुकी थी
इस ज़मीन से अपना रिश्ता खो चुकी थी |

हवाओं संग कही भी झूमती जा रही थी
पीछे पीछे मेरे , महकती ताज़गी आ रही थी |

घटाओं संग आसमान की सैर करने निकलती
कभी पंछी सी उड़कर , किलबिल करती चहेकती \

शाम को थक कर , जब ढूँढा अपना तिकाना
कही भी नज़र ना आया मेरा आशियाना |

जैसी थी वैसी अच्छी , फ़िज़ा बन भटकना दर बदर है
समझ गयी मैं, आसमान नही , ये ज़मी मेरा घर है |

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Ambar Dhara

फ़ासले हे दोनो में इतने
फिर भी दिल से ये हे पास
दूरियाँ है अनगिनत इन में
मन में लिए मिलन की आस
निहारते रेहते एक दूसरे को
हर पल और हर मौसम
नही छोड़ेंगे साथ कभी
शायद लेते हे ये कसम
जब मिलन की ये उमंगे
सारी हदें पार करना चाहती
बूँद बूँद बरसात में भीग कर
सब तरफ़ हरियाली छाती
चाहत ये कभी होगी पूरी
या यूही गुज़रेगा जीवन सारा
या क्षितिज पर सच में कही
मिलते होंगे ये अंबर धरा

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