गुलमोहर
तुम्हे मेरी कसम
सच सच बताना
तुम्हारे सलोने रूप की
छाव तले
जब शरमाई थी मैं
पहेली बार
क्या नही मची थी
केसरिया सनसनी तुम्हारे
मनभावन पत्तों के भीतर?
जब रखा था मैं ने
ज़िंदगी का पहला
गुलाबी प्रेम पृष्ट
क्या नही खिलखिलाई थी
तुम्हारी ललछोही कलियाँ?
गुलमोहर
सच सच बताना
जब पहली बार मेरे भीतर
लहरे उठी थी मासूम प्रेम की
तब तुम थे न मेरे साथ?
कितनी सिंदूरी पत्तियाँ
झरी थी तुमने मेरे उपर
जब मैं नितांत अकेली थी तो
क्यूँ नही बढ़ाया
अपना हाथ?
गुलमोहर
सच सच बताना
बस एप्रिल- मई में पनपते
प्यार के साथी हो?
जुलाइ-अगस्त के दिनो में
जब रोया मेरी आँखों का
सावन
तब क्यूँ नही आए
मुझे सहलाने?
गुलमोहर
सच सच बताना
क्या मेरा प्यार
खरा नही था?
क्या उस वक़्त तुम्हारा
तन हरा नही था,
क्या तब आकाश का सावन
तुम पर झरा नही था ?
कवियत्री – फाल्गुनी
(lokmat papar dec2010)




kshama said,
मार्च 20, 2011 at 5:51 अपराह्न
गुलमोहर
सच सच बताना
क्या मेरा प्यार
खरा नही था?
क्या उस वक़्त तुम्हारा
तन हरा नही था,
क्या तब आकाश का सावन
तुम पर झरा नही था ?
Bahut sundar rachana! Holi mubarak!
suresh said,
फ़रवरी 28, 2012 at 1:22 अपराह्न
jis ki rachna itnie sundar vo kitna sundar hoga
मीनाक्षी said,
मार्च 22, 2011 at 2:51 अपराह्न
प्रकृति में छायावाद हमेशा मन को मोह जाता है… बहुत खूबसूरत कविता…
ताऊ रामपुरिया said,
मार्च 22, 2011 at 3:38 अपराह्न
अति सुंदर और मनमोहक शब्द विन्यास.
होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.
रामराम
shalzmojo said,
मार्च 22, 2011 at 3:57 अपराह्न
wow – really beautiful!!
आशा जोगळेकर said,
मार्च 23, 2011 at 5:17 पूर्वाह्न
बहुत ही कोमल प्यार का अहसास दिलाती हुई गुलमोहरी कविता । प्यार जो मिलन भी है और विरह भी । जिसमें दिल मिलते भी हैं और टूटते भी हैं ।
Hindi Sahitya said,
मार्च 24, 2011 at 12:28 अपराह्न
Bahut khub-
“तुम्हारे सलोने रूप की
छाव तले
जब शरमाई थी मैं
पहेली बार
क्या नही मची थी
केसरिया सनसनी तुम्हारे
मनभावन पत्तों के भीतर?”
Rakesh Rohit said,
मार्च 26, 2011 at 4:36 अपराह्न
प्यार और गुलमोहर का खूबसूरत संयोग बहुत मोहक है.
tailor preeti said,
अप्रैल 7, 2011 at 7:06 पूर्वाह्न
aapko dobara padhne par bahut hi khushi hui ……….
ek achchi kavita ke saath aagaz kiya aapne ..
Rewa Smriti said,
अप्रैल 27, 2011 at 1:09 अपराह्न
कितनी सिंदूरी पत्तियाँ
झरी थी तुमने मेरे उपर
जब मैं नितांत अकेली थी तो
क्यूँ नही बढ़ाया
अपना हाथ?
Yeh katu satya hai jise nazar andaz nahi kiya ja sakta hai…duniya ek tamasha hai…jise tamasha banana aur dekhna pasnd hai, lekin tamasha hote waqt sath dena pasnd nahi hai. isliye gao…”teri aawaaz pe koi na aaye to fir chal akela re….”
rgds
Rakesh Kaushik said,
मई 21, 2011 at 2:56 अपराह्न
लाजवाब रचना – अंतिम पंक्तियाँ तो बेमिशाल – पढवाने के लिए आभार
Bhagwan Dass said,
जून 3, 2011 at 10:09 पूर्वाह्न
कितनी सिंदूरी पत्तियाँ
झरी थी तुमने मेरे उपर
जब मैं नितांत अकेली थी तो
क्यूँ नही बढ़ाया
अपना हाथ?
very very good
Bhagwan Dass said,
जून 3, 2011 at 10:10 पूर्वाह्न
गुलमोहर
सच सच बताना
क्या मेरा प्यार
खरा नही था?
क्या उस वक़्त तुम्हारा
तन हरा नही था,
क्या तब आकाश का सावन
तुम पर झरा नही था ?
Bahut sundar rachana!