nakhra

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तू अलबेली , नई नवेली
तू रुपसी, छेल छबली
चलती हे जब तू ईतरा के
चँदनी सी हँसी बिखराए
तेरी सादगी और मोहिनी
मेरे मन को भी लुभाए
तेरी मोर मयूर सी नीगाहे
लगता हे कुछ केहना चाहे
ना जान कर भी जानती हूँ
लगने लगी हे तू सहेली
नज़दीक आओं जितना तेरे
तू बन जाती एक पहेली
सब कुछ कितना अच्छा तुझ में
पर तेरा घमंड मुझे हे अख़रा
में चली दूजी गली
गोरी कौन सहे तेरा नखरा.

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