कभी तो ऐसा हो

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कभी तो ऐसा हो
नींद पलकों में सिमट जाते ही
ख्वाबों में तुम आ जाओ
हम कुछ कहने से पहले ही
मोहोब्बत की शमा जलाओ

कभी तो ऐसा हो
शाम अपने सिंगार खड़ी
टहल रही हो छत पे
हम आह्ट पहचाने तब तक
तुम देहलीज़ पार भीतर आओ

कभी तो ऐसा हो
खनके कंगन ,छुम छुम भागती पायल
जल्दी से काम निबटाये
एक दिन छुट्टी तुम भी लेलो
कोई रंगीन शरारत सिखलाओ ….

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